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वाराणसी में सेक्स रैकेट बड़े पैमाने पर लेकिन कानून का कोई खौफ नहीं

कृष्णा पंडित की कलम से ✍🏻

वाराणसी जैसे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शहर की पहचान जहां एक ओर गंगा आरती और धार्मिक आस्था से जुड़ी है, वहीं दूसरी ओर यहां अवैध गतिविधियों की खबरें भी समय-समय पर सामने आती रही हैं। हाल के वर्षों में सेक्स रैकेट के बढ़ते नेटवर्क ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कानून का डर क्यों खत्म होता दिख रहा है?
वाराणसी में कई बार पुलिस छापेमारी के दौरान होटलों, लॉजों और किराए के मकानों से सेक्स रैकेट पकड़े गए हैं। लेकिन हर कार्रवाई के बाद कुछ समय के लिए सन्नाटा और फिर वही धंधा—यह चक्र लगातार चलता नजर आता है। इससे साफ संकेत मिलता है कि अपराधियों के मन में कानून का भय कमजोर पड़ रहा है।

नेटवर्क का फैलता जाल और सहयोग का कमाल

यह धंधा अब केवल सीमित क्षेत्रों तक नहीं रह गया है, बल्कि ऑनलाइन माध्यमों, सोशल मीडिया और ऐप्स के जरिए संगठित तरीके से संचालित हो रहा है। बाहरी राज्यों से लोगों को लाकर इस अवैध कारोबार में शामिल किया जाता है, जिससे इसे रोकना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। ज्यादातर तो देखा जाता है कि सहयोगी बड़ी रसूख वाले लोग होते हैं कुछ वर्दी में तो कुछ सफेद कुर्ते में आजकल तो कमाई का एक बड़ा माध्यम बनता जा रहा है !

पुलिस की निगरानी भी सिर्फ एक कहानी है पता सब है लेकिन कुछ कर नहीं पाते

स्थानीय प्रशासन को होटल और लॉजों का सत्यापन सुनिश्चित करना चाहिए

धंधा नहीं, संगठित गुनाह

यह कोई छोटा-मोटा अपराध नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क है—जिसमें दलाल, होटल संचालक, और कहीं न कहीं सिस्टम के अंदर बैठे कुछ लोग भी शामिल होने की बू देता है। वरना कैसे संभव है कि बार-बार पकड़े जाने के बावजूद यह रैकेट जिंदा रहता है?

सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि यह धंधा अब छुपकर नहीं, बल्कि खुलेआम चल रहा है। ऑनलाइन ऐप्स, सोशल मीडिया और कोड वर्ड्स के जरिए ग्राहकों को बुलाया जा रहा है—और प्रशासन या तो अंजान बना है या फिर आंखें मूंदे बैठा है।

जिम्मेदारी से भागता सिस्टम

अगर सख्ती से कार्रवाई हो, तो यह धंधा एक झटके में खत्म हो सकता है। लेकिन जब कार्रवाई दिखावे की हो, तो अपराधियों के हौसले बुलंद ही रहेंगे। सवाल यह है कि क्या किसी को सच में इसे खत्म करना है, या सिर्फ “कार्रवाई का नाटक” जारी रखना है?

वाराणसी की पहचान सिर्फ मंदिरों और घाटों से नहीं बच सकती, अगर उसकी सड़कों पर कानून की धज्जियां उड़ती रहें। अब वक्त आ गया है कि दिखावे की कार्रवाई नहीं, बल्कि जड़ से सफाई हो—वरना यह शहर धीरे-धीरे अपनी असली पहचान खो देगा, और जिम्मेदार लोग सिर्फ बयानबाजी में व्यस्त रह जाएंगे।

समाज को भी जागरूक होकर संदिग्ध गतिविधियों की सूचना देनी होगी ! काशी जैसा शहर जहां की हवा और पानी दोनों का अपना मिजाज है फिर भी लोग अनैतिक धंधों को अंजाम दे रहे हैं जहां स्वयं प्रधानमंत्री दो बार से सांसद हैं और सभासद से विधायक और ग्राम पंचायत सदस्य तक सभी भाजपा के विकास वाले भैया जी लोग कुर्सी पर आसीन हैं लेकिन मजाल है की ऐसे धंधों पर रोक लगा सके !

जब बार-बार कार्रवाई के बावजूद यह धंधा बंद नहीं होता, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कहीं न कहीं सिस्टम में ढील या मिलीभगत तो नहीं? अगर सख्त और निरंतर कार्रवाई हो, तो ऐसे रैकेट को जड़ से खत्म किया जा सकता है।
वाराणसी जैसे शहर की गरिमा बनाए रखने के लिए जरूरी है कि कानून का खौफ अपराधियों के मन में साफ दिखाई दे। केवल छापेमारी नहीं, बल्कि स्थायी समाधान और जवाबदेही तय करना ही इस समस्या का असली इलाज है !!

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