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अक्षय तृतीया के दूसरे दिन माँ मणिकर्णिका का दिव्य उत्तर पूजन, 56 भोग अर्पित

पुर्वांचल राज्य ब्यूरो वाराणसी

 

वाराणसी। अक्षय तृतीया के पावन पर्व के दूसरे दिन प्रधान पुरोहित पं जयेंद्रनाथ दुबे बब्बू महाराज के नेतृत्व में माँ मणिकर्णिका देवी का दिव्य उत्तर पूजन पूरे विधि-विधान एवं वैदिक मंत्रोच्चार के साथ सम्पन्न हुआ। इस विशेष अवसर पर माँ को छप्पन भोग अर्पित किए गए, जिससे पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर हो उठा। श्रद्धालुओं ने अत्यंत श्रद्धा एवं आस्था के साथ माँ का पूजन-अर्चन किया और अपने जीवन में सुख, समृद्धि तथा कल्याण की कामना की।
पूजन कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में भक्तगण उपस्थित रहे। सभी श्रद्धालुओं ने परंपरानुसार पवित्र मणिकर्णिका कुंड में स्नान किया। धार्मिक मान्यता है कि अक्षय तृतीया के पावन काल में इस कुंड में स्नान करने तथा माँ मणिकर्णिका के दर्शन मात्र से ही अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। इसी विश्वास और आस्था के साथ दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं ने इस अनुष्ठान में भाग लिया और स्वयं को धन्य महसूस किया।
उत्तर पूजन के उपरांत परंपरा के अनुसार माँ मणिकर्णिका की प्रतिमा को पुनः प्रधान पुरोहित के निवास स्थान पर पूरे वर्ष के लिए विधिवत स्थापित किया गया। वैदिक रीति-रिवाजों और मंत्रोच्चार के बीच यह प्रक्रिया सम्पन्न हुई, गई जिसने पूरे आयोजन को और अधिक दिव्यता प्रदान की। इस दौरान उपस्थित श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से माँ के जयकारे लगाए और वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
मौके पर प्रधान पुरोहित पं जयेंद्रनाथ दुबे बब्बू महाराज ने बताया कि अक्षय तृतीया का पर्व सनातन परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस दिन किया गया स्नान, दान, जप और पूजन कभी नष्ट नहीं होता, बल्कि जीवनभर शुभ फल प्रदान करता है। यही कारण है कि इस दिन और इसके अगले दिन भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस पवित्र स्थल पर पहुंचकर धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं।
पूरे आयोजन के दौरान अनुशासन और व्यवस्था का विशेष ध्यान रखा गया। श्रद्धालुओं को सुगमता से दर्शन एवं पूजन करने का अवसर मिला। स्थानीय लोगों के साथ-साथ बाहर से आए भक्तों में भी विशेष उत्साह देखने को मिला।
समापन के अवसर पर श्रद्धालुओं ने “जय माँ मणिकर्णिका” के जयघोष के साथ अपनी आस्था प्रकट की और माँ से समस्त मानव जाति के कल्याण, सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना की। यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा और आस्था का एक विशेष केंद्र भी बना।

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