काशी में रूसी रंगों की बरसात – जब विद्यार्थियों ने सीखे ‘स्पासिबा’ के साथ रूस के त्योहारों के राज़
वाराणसी, 11 नवम्बर 2025
काशी के गलियारों में इन दिनों सिर्फ़ संस्कृत के श्लोक ही नहीं, रूसी भाषा के मधुर स्वर भी गूंज रहे हैं। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में रूस की संस्कृति और भाषा का अनोखा संगम विद्यार्थियों के लिए एक यादगार अनुभव बन गया है।
विद्यापीठ के *अंग्रेजी एवं अन्य विदेशी भाषा विभाग* और *कोज़्मा मिनिन निज़नी नोवगोरोद स्टेट पेडागॉजिकल यूनिवर्सिटी (रूस)* के संयुक्त तत्वावधान में चल रहे दो सप्ताह के विशेष पाठ्यक्रम “रूसी चरित्र: भाषा के दर्पण में” का पहला सप्ताह हंसी, गीत और नई खोजों के बीच संपन्न हुआ।
रूसी भाषा विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर *डॉ. नीरज धनकड़* ने कहा —
> “यह कार्यक्रम विद्यार्थियों को शब्दों से आगे ले जाकर भावों और संस्कृतियों के संसार में प्रवेश कराता है। भाषा तभी जीवंत होती है जब वह जीवन में घुल-मिल जाए।”
छात्रों ने सीखा कि रूसी में ‘धन्यवाद’ *(Спасибо)* कहना जितना आसान है, उतनी ही गहराई उसमें छिपी संस्कृति में है। संवाद अभ्यास के दौरान विद्यार्थियों ने रूसी समाज के *आदर-संस्कार, पारिवारिक मूल्यों और त्योहारों के प्रतीकात्मक अर्थ* को जाना।
रूस से आईं प्रसिद्ध भाषाविद् *डॉ. नज़ेज़्दा इगोरएवना* ने सत्र को एक उत्सव में बदल दिया। उन्होंने छात्रों को बताया कि कैसे रूस में “मास्लेनीत्सा” (पैनकेक फेस्टिवल) सूर्य की वापसी का प्रतीक है, जबकि “नववर्ष” पर सड़कों से लेकर घरों तक रोशनी और संगीत का समंदर होता है।
सत्र के दौरान विद्यार्थियों ने रूसी पारंपरिक व्यंजन — *ब्लिनी, **बोर्श, और **पेलमेनी* — के बारे में जाना, जिससे माहौल में रूसी स्वाद घुल गया।
सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम के छात्रों ने रूसी में 1 से 100 तक की गिनती सीखते हुए व्यावहारिक प्रयोगों पर अभ्यास किया — जैसे उम्र, कीमत और वस्तुओं की संख्या बताना। वहीं डिप्लोमा और एडवांस डिप्लोमा के छात्रों ने दैनिक रूसी वार्तालाप का अभ्यास करते हुए “रूसी में सोचने” की शुरुआत की।
कार्यक्रम न केवल भाषाई दक्षता बढ़ा रहा है, बल्कि भारत और रूस के बीच *शैक्षणिक और सांस्कृतिक मैत्री के पुल* को भी मजबूत कर रहा है। विद्यार्थी कहते हैं कि अब उन्हें रूस सिर्फ़ एक देश नहीं, बल्कि एक अनुभव लगता है।
> “अब हमें समझ आता है कि हर भाषा एक नई दुनिया के दरवाज़े खोलती है,” — एक छात्रा ने कहा।
काशी की धरती पर जब भारतीय संस्कृति की धुन में रूसी स्वर घुलते हैं, तो यह सिर्फ़ शिक्षा नहीं- संस्कृतियों का उत्सव* बन जाता है।










