न सोने का गुरूर है, न चाँदी की प्यास,
लोभ से दूर रहना ही है असली सन्यास
जन-जन की आवाज कृष्णा पंडित की कलम✍🏻
भारत में ऐसे ही लोगों ने संत का एक नया चेहरा आसमानी उड़न खटोला से जमीन तक का सफर पैदल तय किया है आश्चर्य मत होना और संत जैसा कि नाम और स्वभाव होना चाहिए कलयुग में दोनों विपरीत है अब संत ,साधु नहीं रहा नहीं सांसारिक माया से दूर जितना हो सके भोग विलासिता से पूर्ण जीवन के साथ पूरी बाह्य आडंबर और लंबी चौड़ी भौकाली व्यवस्था ही आज का संत की परिभाषा है ! गलती से यदि आप उनको भारतीय संस्कृति और संत रूपी आवरण का आभूषण समझ बैठे तो आप अनभिज्ञ और नासमझ है विलासिता पूर्ण जीवन जीने वाले साधु संतों का मानना है कि जीवन में राजनीतिक प्रवेश के साथ व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए हम लोगों को इस जीवन का भोग करना पड़ रहा है क्योंकि राजनीति में कोई ऐसा चेहरा नहीं जिसका चरित्र और दामन पर दाग ना हो तो फिर ढोंगी जिनके चेहरे पर साधु का वेशभूषा और बदन पर साधारण कुर्ता क्यों इनको भी राजनीतिक धुरंधर की तरह मटका की कुर्ते और पजामे के साथ महंगी महंगी चश्मा और हाथों में लाडो जैसी कंपनी का घड़ी जो की देखने को मिल रहा है वस्त्र भी बदल लेना चाहिए !
जातियों में आरक्षण और शिक्षा में भीख की मंजूरी
आवाज उठी है तो दूर तक जानी चाहिए भारत में निरंतर नकली चेहरे असली दमन का दस्तूर बन संविधान के लिए ही नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था को रोज अपनी ताकत के साथ कुचल रहे हैं लेकिन हमारी गुलामी और सड़ी न्याय व्यवस्था की तस्वीर और तकदीर ही ऐसी है जहां जातियों में गरीबी और अमीरी का भेदभाव स्थापित कर दिया गया जहां उम्र में आरक्षण और शिक्षा में भीख की भी मंजूरी दी गई ! पूरे भारतवर्ष में संविधान का दमन और नेताओं का चलन की सैकड़ो किताब भी कम और स्याही खत्म हो जाएगा इनके सामाजिक सेवा का उदाहरण और स्वरूप बताते दिखाते..
समाज सेवा के नाम पर लाखों रुपए मासिक वेतन और संसाधन से लैस राजनीतिक लोगों ने भारत को जितना मान मर्दन किया उतना तो अंग्रेजों ने भी नहीं किया था क्योंकि उनका मकसद लूटने का था उन्होंने लूटा और जितना हो सके बर्बाद किया लेकिन आजादी के तराने के साथ गुनगुनाने वाले हमारे प्रिय भारत के सांसद और विधायक जिनका निधि और स्वतंत्र विचार मानव की अभिव्यक्ति के नाम पर गजब का माहौल भारतीयों को दिया जा रहा है जिससे कि सिर्फ लाचारी और गरीबी को फैलाई नहीं गई बल्कि पूरी तरीके से इसको समाज में एक बीमारी के तौर पर छोड़ दिया गया जहां सिर्फ इलाज के नाम पर लूट, खसोट और ताकत का भरपूर प्रदर्शन ही नेताओं की जीवन शैली को अंगीकार करता है ! मानस सेवा एक धर्म है जो व्यक्ति के शिवांश का स्वरूप अर्थात ऐश्वर्य से कहीं दूर निर्मल और शहर स्वभाव के साथ आंतरिक मन का असली ज्वर होता है !
किसी भी काम में व्यक्ति की पहचान उसके द्वारा की जा रही सेवा का भाव और स्वभाव से उसका नामकरण किया जाता है ज्यादातर देखा जाता है कि व्यवसाय करने वाले व्यवसाय रोजगार करने वाले व्यापारी और पूजा करने वाले पुजारी होते हैं लेकिन आजाद भारत में सेवा करने वाले ना समाजसेवी रहे नहीं राजनीतिक चेहरे समाज की दशा और दिशा को बदलने वाले सेवक आज यदि सचमुच में दौड़ मची है तो सिर्फ संसाधन की पकड़ और अपने ओहदे का चीर हरण.. का
जहां लाचारी गरीबी सिर्फ सड़कों पर ही नहीं बल्कि आंगन की दहलीज और घरों में कैद दम तोड़ रही है वहीं झूठी और मन गढ़त नकली व्यवस्था भारतीय भूभाग और सामाजिक चेतना की हत्या कर रहा है ! अमूल्य संस्कृति जिसकी वेदना भरी कहानी आज टूटती टहनियों की सिसकती न थमने आवाज बन इस दुनियां को अलबिदा कह रही है! बहुत साधारण और शानदार व्यक्तित्व के जो धनी लोग हैं ऐसे प्रपंच और पचड़ों से दूर रहकर अपनी दिनचर्या तय करते हुए जीवन यापन करना चाहते हैं ! जिनका उद्देश्य जीवन को जीना और अमर तत्व को प्राप्त करना होता है !
लोभ की चादर ओढ़कर जो चला आदमी आज बाज़ार में,
उसने अपना ज़मीर गिरवी रख दिया सरकारी दरबार में 💐 ✍🏻 (*कृष्णा पंडित)









