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हर वर्ष बढ़ती मिलेनियर पलायन की प्रवृत्ति पर गंभीर बहस जरूरी
भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेज़ी से उभरती ताकत के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है। डिजिटल क्रांति, बुनियादी ढांचा विस्तार और स्टार्टअप संस्कृति की चर्चा अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंची है। इसके बावजूद एक समानांतर चिंता भी लगातार गहराती जा रही है—हर वर्ष बड़ी संख्या में उच्च संपत्ति वाले भारतीय (मिलेनियर) विदेशों की ओर रुख कर रहे हैं।
आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत कर-योजना या जीवनशैली का मामला नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक और नीतिगत वातावरण का संकेत भी मानी जा रही है। जब पूंजी का एक हिस्सा स्थायी रूप से देश से बाहर जाता है, तो उसका प्रभाव निवेश, रोजगार सृजन और कर राजस्व पर भी पड़ता है।
राजनीतिक माहौल और आर्थिक विश्वास
बीते कुछ वर्षों में राजनीतिक विमर्श अधिक तीखा हुआ है। आरोप-प्रत्यारोप, वैचारिक टकराव और चुनावी ध्रुवीकरण ने सार्वजनिक संवाद की दिशा बदल दी है। उद्योग जगत के कुछ प्रतिनिधियों का मानना है कि निवेश के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता नीति की स्थिरता और प्रशासनिक पारदर्शिता है।
यदि नीतिगत बदलाव बार-बार हों, जांच और नियामक प्रक्रियाएं जटिल हों, या निर्णय प्रक्रिया में स्पष्टता का अभाव हो, तो दीर्घकालिक निवेश प्रभावित हो सकता है। आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि पूंजी स्वभाव से सुरक्षित और पूर्वानुमानित वातावरण की तलाश करती है।
मिलेनियर पलायन: केवल संख्या नहीं, संकेत
मिलेनियरों के विदेश जाने का अर्थ केवल व्यक्तिगत निवास परिवर्तन नहीं है। इसके साथ संभावित उद्योग विस्तार, स्टार्टअप निवेश और रोजगार अवसर भी स्थानांतरित हो सकते हैं। हालांकि यह भी सच है कि वैश्वीकरण के दौर में अंतरराष्ट्रीय गतिशीलता सामान्य आर्थिक प्रवृत्ति बन चुकी है। बेहतर शिक्षा, वैश्विक व्यापार अवसर और जीवन की गुणवत्ता भी प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
सरकार और नीति निर्माताओं के सामने चुनौती
भारत के पास विशाल घरेलू बाजार, युवा जनसंख्या और तकनीकी क्षमता जैसी मजबूत आधारशिला है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि—
कर ढांचा सरल और पूर्वानुमेय बने
नियामक प्रक्रियाएं पारदर्शी हों
न्यायिक प्रक्रिया तेज़ और प्रभावी हो
उद्योग जगत के साथ संवाद संस्थागत स्तर पर मजबूत किया जाए
आर्थिक स्थिरता और राजनीतिक परिपक्वता साथ-साथ चलें, तभी विकास का लक्ष्य टिकाऊ रूप से हासिल किया जा सकता है।
भारत के विकास की कहानी केवल सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर से नहीं आंकी जाएगी, बल्कि इस बात से भी कि देश अपने उद्यमियों, निवेशकों और प्रतिभाशाली नागरिकों के लिए कितना भरोसेमंद वातावरण तैयार कर पाता है।
यदि हर वर्ष बढ़ती पूंजी पलायन की प्रवृत्ति को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो यह दीर्घकाल में आर्थिक रणनीति के लिए चुनौती बन सकती है। समय की मांग है कि राजनीतिक विमर्श से ऊपर उठकर आर्थिक विश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
सबसे गंभीर बात यह है कि भारत में कानून व्यवस्था और न्यायिक व्यवस्था दोनों ही आम जनमानस के लिए राहत देने की बजाय चुनौती है टैक्स की मार झेल रहा मध्यम वर्गीय लगातार आत्महत्या कर रहा है और तो और जिस तरीके से जातिगत व्यवस्थाओं को लेकर सरकार स्थाई रूप से आरक्षण और वर्ग विशेष के साथ भेदभाव कर रही है यह भी एक मूल कारण है जब पढ़े लिखे और साक्षर लोग दूसरे देश की नागरिकता लेंगे तो अपना देश कमजोर ही होगा पिछले कई वर्षों से ज्यादातर डॉक्टर से इंजीनियर और उद्योगपति लगातार भारत से प्लान कर रहे हैं लेकिन यहां राजनीति के नमूनों द्वारा सिर्फ डफली बजाकर ही अपनी सीना चौड़ी किया जा रहा है !










