“जलवायु परिवर्तन और उत्तर प्रदेश की कृषि : संकट, सच्चाई और समाधान”
कलम से – अपर्णा श्रीवास्तव चेयरपर्सन
नवचेतना एफपीओ – मिर्जापुर
भूमिका : जब मौसम ने बदली खेती की परिभाषा
कभी गंगा–यमुना की धरती उत्तर प्रदेश को भारत का “अन्न भंडार” कहा जाता था।
पर अब किसान का चेहरा पहले जैसा नहीं रहा — न उसके मौसम तय हैं, न फसल का भरोसा।
जलवायु परिवर्तन (Climate Change) ने कृषि को सबसे गहराई से प्रभावित किया है, और यह प्रभाव अब केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों में नहीं, बल्कि हर खेत और हर किसान के अनुभव में दिखाई दे रहा है।
उत्तर प्रदेश की स्थिति : आंकड़े जो चेतावनी बन चुके हैं
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और कृषि मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं —
पिछले 30 वर्षों में उत्तर प्रदेश का औसत तापमान लगभग 0.8°C बढ़ा है।
मानसून की औसत वर्षा में 11% की कमी आई है, जबकि असमान वर्षा (अचानक बाढ़ या लंबे सूखे) की घटनाएँ तीन गुना बढ़ी हैं।
पूर्वांचल और बुंदेलखंड के जिलों में पिछले दस वर्षों में सूखा या अर्ध-सूखा घोषित होने की घटनाएँ 18% बढ़ी हैं।
गेहूं की उत्पादकता में तापमान वृद्धि के कारण प्रति हेक्टेयर 8–10% गिरावट देखी गई है।
धान की पैदावार में भी वर्षा के असंतुलन से औसतन 5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक कमी दर्ज हुई है।
मुख्य फसलें सबसे अधिक प्रभावित
गेहूं – फरवरी–मार्च में तापमान की अचानक वृद्धि से grains shrivel (दाने सिकुड़ जाते हैं), जिससे उपज घटती है।
धान – देर से बारिश आने और अनियमित बरसात के कारण रोपाई चक्र प्रभावित होता है।
गन्ना – बढ़ते तापमान और घटते भूजल स्तर से juice recovery कम हो रही है।
दालें और तिलहन – असमान वर्षा और फफूंद जनित रोगों में वृद्धि।
“अब मौसम नहीं चलता किसान के हिसाब से, बल्कि किसान को मौसम के मूड से समझौता करना पड़ रहा है।”
कृषि संकट का सामाजिक चेहरा
जलवायु संकट ने केवल खेत नहीं, किसान का मन और मनोबल भी झुलसा दिया है।
बुंदेलखंड और पूर्वांचल में लगातार सूखा और असफल फसलें कर्ज, पलायन और आत्महत्या जैसी गंभीर सामाजिक स्थितियाँ पैदा कर रही हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में देश में कुल 11,290 किसान आत्महत्याएँ दर्ज हुईं, जिनमें से लगभग 7% उत्तर प्रदेश से थीं।
नीतिगत दृष्टि से चुनौतियाँ
फसल बीमा योजना की कवरेज ग्रामीण स्तर पर अब भी अपर्याप्त है — केवल 42% किसानों तक इसकी पहुँच है।
सिंचाई पर निर्भरता अत्यधिक है — राज्य की लगभग 65% कृषि वर्षा आधारित है।
जल संरक्षण और सूक्ष्म सिंचाई के लिए दी जाने वाली सब्सिडी योजनाएँ प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पा रही हैं।
क्या हो जरूरी नियोजन
जल–संरक्षण आधारित कृषि प्रणाली
हर ब्लॉक स्तर पर जलग्रहण पुनर्भरण योजनाएँ और तालाब पुनर्जीवन कार्यक्रम लागू करने की आवश्यकता है।
ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को अनिवार्य रूप से प्रोत्साहित किया जाए।
जलवायु–अनुकूल फसल चक्र (Climate-Resilient Cropping Pattern)
परंपरागत फसलों से हटकर कम पानी, कम तापमान-संवेदनशील फसलें जैसे – बाजरा, उड़द, अरहर, सहजन, एलोवेरा और मेंथा – को बढ़ावा देना चाहिए।
“एक ज़िला एक जलवायु योजना” (ODCC) के तहत स्थानीय अनुकूल फसल मैपिंग की आवश्यकता है।
तकनीकी और डेटा–आधारित खेती
सैटेलाइट आधारित मौसम पूर्वानुमान, ड्रोन मॉनिटरिंग, और मिट्टी सेंसर सिस्टम के उपयोग को ग्रामीण स्तर तक पहुँचाना होगा।
किसान प्रशिक्षण और समुदाय आधारित योजना
प्रत्येक ब्लॉक में क्लाइमेट स्कूल ऑफ़ फार्मिंग जैसी पहल होनी चाहिए, ताकि किसान अपने क्षेत्र के जलवायु व्यवहार को समझ सके।
निष्कर्ष : समाधान की जड़ें गांवों में ही हैं
जलवायु परिवर्तन का असर वैश्विक है, लेकिन उसका दर्द सबसे गहराई से गांवों के खेतों में महसूस होता है।
अगर उत्तर प्रदेश को सच में “हरित प्रदेश” बनाना है, तो नीति निर्माण केवल ऊपर से नहीं, किसान के अनुभव से नीचे से ऊपर तक होना चाहिए।
“प्रकृति से संवाद ही समाधान है — तकनीक और परंपरा का संतुलन ही भविष्य की खेती का आधार बनेगा।










