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समृद्ध नारी–समृद्ध भारत के दृष्टिकोण को रेखांकित करता शैक्षणिक सत्र

समृद्ध नारी–समृद्ध भारत के दृष्टिकोण को रेखांकित करता शैक्षणिक सत्र

वाराणसी, 13 दिसंबर। काशी तमिल संगमम 4.0 के अंतर्गत “समृद्ध नारी–समृद्ध भारत” विषय पर एक विचारोत्तेजक एवं प्रेरक शैक्षणिक सत्र का सफल आयोजन किया गया। इस सत्र में भारत के सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास में महिलाओं की केंद्रीय भूमिका पर गहन विमर्श किया गया। कार्यक्रम का समन्वय डॉ. गौरी बालचंदर, आईआईटी (बीएचयू) द्वारा किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ बीएचयू के कुलगीत से हुआ, जिसने पूरे सत्र को गरिमामय और सांस्कृतिक स्वर प्रदान किया। कुलगीत की प्रस्तुति राघव शर्मा (तबला), हर्षित पाल (हारमोनियम) तथा गायन में वर्षा बासख, श्रेय सोनकर और अदिति जायसवाल द्वारा की गई।

स्वागत संबोधन में प्रो. आशीष त्रिपाठी (हिंदी विभाग) ने वासुकी, आडल और तिलकावती परंपराओं से आए प्रतिभागियों का हार्दिक स्वागत किया। उन्होंने तमिल को भारत की सबसे प्राचीन जीवंत भाषाओं में से एक बताते हुए कहा कि वैज्ञानिक साक्ष्य इसे संस्कृत से भी अधिक प्राचीन मानते हैं। उन्होंने इस सत्र को तमिल और प्राकृत भाषिक परंपराओं के प्रतीकात्मक संगम के रूप में रेखांकित किया। अपने वक्तव्य में उन्होंने रानी वेलु नचियार, डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी, मुवालूर राममिर्थम, एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी तथा डॉ. इंदिरा नुई जैसी प्रेरणादायी महिला विभूतियों का स्मरण किया, जिन्होंने महिला सशक्तिकरण और सामाजिक सुधार में उल्लेखनीय योगदान दिया।

इस अवसर पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू), आईआईटी (बीएचयू) तथा काशी तमिल संगमम की यात्रा पर आधारित एक संक्षिप्त वृत्तचित्र का प्रदर्शन किया गया, जिसने प्रतिभागियों को इस पहल की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से परिचित कराया।

प्रो. मनीषा मेहरोत्रा (अर्थशास्त्र विभाग) ने भौगोलिक संकेतक (जीआई ) टैग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह स्वदेशी उत्पादों की पहचान, संरक्षण और वैश्विक प्रचार में सहायक है। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के 70 जीआई टैग वाले उत्पादों में से 33 वाराणसी से संबंधित हैं। एक जनपद–एक उत्पाद (ओडीओपी) और लखपति दीदी जैसी सरकारी पहलों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ये योजनाएं गरीबी उन्मूलन और महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि तमिलनाडु में 33 प्रतिशत एमएसएमई व्यवसाय महिलाओं के स्वामित्व में हैं, जो आर्थिक क्षेत्र में उनकी सशक्त भागीदारी को दर्शाता है।

तमिलनाडु के सामाजिक परिप्रेक्ष्य को प्रस्तुत करते हुए वीकेपी ने कहा कि भारत के पास अपार पारंपरिक ज्ञान है, जिसे नैतिक और समाजोपयोगी कार्यों में रूपांतरित करने की आवश्यकता है। उन्होंने बनारसी और कांचीपुरम साड़ियों तथा कालानमक चावल और कूर्ग संतरे जैसे उत्पादों की तुलना का उल्लेख करते हुए विभिन्न क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक और आर्थिक जुड़ाव को रेखांकित किया।
लखपति दीदी पहल के संदर्भ में प्रो. मेहरोत्रा ने मेरठ की विद्युत सखी संगीता और लखनऊ की बैंकिंग सखी सरला जैसे सफल उदाहरणों का उल्लेख किया, जिन्होंने वित्तीय समावेशन और सामुदायिक विश्वास को सुदृढ़ किया। उन्होंने दक्षिण भारत की नित्या जैसी उद्यमी का भी उदाहरण दिया, जिन्होंने लगभग 3,000 लोगों को रोजगार प्रदान किया।

पद्मश्री रजनीकांत (भारत के “जीआई मैन”) ने इस अवसर को गर्व और पुण्य का विषय बताया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “वोकल फॉर लोकल” दृष्टिकोण को महिला सशक्तिकरण, हथकरघा और पारंपरिक शिल्प से जोड़ते हुए प्रस्तुत किया। उन्होंने काशी की ओर सहस्राब्दियों से चले आ रहे सभ्यतागत प्रवाह की चर्चा की तथा कहा कि काशी विश्वनाथ धाम के पुनर्विकास के कारण पिछले चार वर्षों में लगभग 25 करोड़ श्रद्धालु एवं पर्यटक काशी आए हैं। साथ ही उन्होंने विरासत-आधारित आजीविकाओं के संरक्षण में जीआई टैग की बढ़ती भूमिका पर बल दिया।

प्रख्यात विदुषी एवं संगीतज्ञ श्रीमती शिवश्री स्कन्दप्रसाद ने कहा कि उन्हें काशी और तमिलनाडु में कोई सांस्कृतिक दूरी महसूस नहीं होती, क्योंकि दोनों ही आध्यात्मिक परंपराओं में गहराई से रचे-बसे हैं। उन्होंने महिलाओं की ऐतिहासिक यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि वैदिक काल में वे ज्ञान और विवेक की संवाहक थीं, जबकि मध्यकाल में उन्हें अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि समृद्धि स्वयं स्त्री तत्व “श्री” में निहित है और “भक्ति” वह साझा भाषा है, जो भारत को क्षेत्रीय और भाषाई भिन्नताओं से परे एक सूत्र में बांधती है। उन्होंने यह भी कहा कि महिलाएं ऐतिहासिक रूप से परिवार की वित्त प्रबंधक और भावनात्मक आधार रही हैं। स्वामी विवेकानंद के विचारों का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि महिलाओं को शिक्षित करने से राष्ट्र को दिशा मिलती है और धर्म सदैव अर्थ से पहले आता है। उन्होंने 300 छात्रों की काशी यात्रा का भी उल्लेख किया, जो तमिल भाषा सीखने के उद्देश्य से काशी आएंगे।

कार्यक्रम को जगन मोहन राधा रमण द्वारा प्रस्तुत भक्ति गीतों की भावपूर्ण प्रस्तुति ने और अधिक समृद्ध किया, जिसने श्रोताओं को काशी और तमिलनाडु की साझा आध्यात्मिक विरासत से भावनात्मक रूप से जोड़ दिया।

मीनाक्षी झा (सीडब्ल्यूएससी, एफएसएस, बीएचयू) ने महिलाओं के आंदोलनों की जड़ों को औपनिवेशिक काल से जोड़ते हुए बताया कि मद्रास प्रेसीडेंसी महिलाओं के संगठनों का प्रमुख केंद्र रही। उन्होंने महात्मा गांधी से प्रेरित सत्याग्रह आंदोलनों में तमिल महिलाओं की सक्रिय भागीदारी का उल्लेख किया, जिसमें दक्षिण अफ्रीका के अनुभवों का भी प्रभाव था। उन्होंने कहा कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र और सशक्त महिलाएं भारत को एक सशक्त राष्ट्र बनाती हैं और यह स्पष्ट किया कि “महिला मुक्ति महिलाओं को दिया गया उपहार नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता को दिया गया उपहार है।”

कार्यक्रम का समापन डॉ. आलोक पांडेय (आईआरडीपी, बीएचयू) द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिसमें उन्होंने सभी वक्ताओं, कलाकारों, आयोजकों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

यह शैक्षणिक सत्र काशी तमिल संगमम 4.0 के मूल संदेश की पुनः पुष्टि करता है कि भारत का उज्ज्वल और समृद्ध भविष्य महिलाओं के सशक्तिकरण, सम्मान और नेतृत्व से अविभाज्य रूप से जुड़ा हुआ है।

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