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स्वामी प्रेमानन्द महाराज के दिव्य उपदेशों से सजी ‘परम सुख’ पुस्तक का विमोचन

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से भेंट के पश्चात हुआ लोकार्पण

400 उपदेशों व जीवन यात्रा को समेटे पहली आध्यात्मिक कृति

पूर्वांचल राज्य ब्यूरो वाराणसी।

श्रीवृन्दावन धाम के प्रख्यात संत, श्री राधा-रानी एवं भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज एक बार पुनः आध्यात्मिक और साहित्यिक जगत में केंद्रबिंदु बन गए हैं। उनके दिव्य उपदेशों और प्रेरणादायक जीवन यात्रा पर आधारित पुस्तक ‘परम सुख’ का भव्य विमोचन श्रद्धा और उत्साह के बीच सम्पन्न हुआ।
यह पावन अवसर उस समय और भी विशेष बन गया जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से स्वामी जी की भेंट के अगले ही दिन, वृन्दावन स्थित उनके आश्रम श्री हित राधा केलि कुंज में इस ग्रंथ का लोकार्पण किया गया। पुस्तक के लेखक एवं संपादक राधेकृष्ण ने स्वामी जी को इसकी प्रथम प्रति भेंट कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।
320 पृष्ठों में विस्तृत यह पुस्तक दो भागों में विभाजित है। पहले भाग में स्वामी जी की तप, त्याग और भक्ति से ओतप्रोत जीवन यात्रा का वर्णन है, जबकि दूसरे भाग में उनके लगभग 400 दिव्य उपदेशों का संकलन किया गया है, जो साधकों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होंगे। इस महत्वपूर्ण कृति के संपादन में आईपीएस घनश्याम चौरसिया का विशेष योगदान रहा है।
संपादक राधेकृष्ण के अनुसार, स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज का मूल नाम अनिरुद्ध कुमार पाण्डेय था। उनका जन्म कानपुर के एक धार्मिक परिवार में हुआ। किशोरावस्था में ही वैराग्य की भावना जागृत होने पर उन्होंने मात्र 13 वर्ष की आयु में गृहत्याग कर ईश्वर की खोज का मार्ग अपनाया। काशी में गंगा तट पर कठोर साधना और रासलीला के दिव्य प्रभाव से वे वृन्दावन पहुंचे, जहां उन्होंने स्वयं को श्री राधा-कृष्ण की भक्ति में पूर्णतः समर्पित कर दिया।
पुस्तक में उनके जीवन से जुड़े प्रेरणादायक प्रसंगों के साथ-साथ उनके पिता शंभू पाण्डेय द्वारा दिए गए तीन वचनों का भी उल्लेख है, जिनका पालन स्वामी जी आज भी निष्ठापूर्वक कर रहे हैं।
इस आध्यात्मिक कृति का प्रकाशन ईकोक्रेजी कम्युनिकेशन्स द्वारा किया गया है, जबकि इसके वितरण एवं विपणन की जिम्मेदारी सृजन प्रकाशन को सौंपी गई है। उल्लेखनीय है कि लेखक राधेकृष्ण इससे पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जीवन पर आधारित चर्चित पुस्तक ‘नरेन्द्र मोदी: द ग्लोबल लीडर’ भी लिख चुके हैं।
पुस्तक की प्रस्तावना श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के अर्चक श्रीकांत मिश्र द्वारा लिखी गई है, जो इस ग्रंथ की आध्यात्मिक गरिमा को और अधिक बढ़ाती है।

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