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ट्रैफिक पुलिस बनी मूक दर्शक, शहर में माफिया का राज आस्था बनाम अव्यवस्था

पूर्वांचल राज्य ब्यूरो, वाराणसी।

 

जहाँ एक ओर गंगा घाटों पर आस्था का जनसैलाब उमड़ता है, वहीं दूसरी ओर वाराणसी की सड़कों पर अव्यवस्था का मंजर हावी है। श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगाएँ या नहीं, लेकिन आम नागरिक हर दिन धूल, धुएं और धक्कों के बीच ‘सड़क स्नान’ करने को मजबूर है।

 

*अवैध वाहनों का साम्राज्य*

 

वाराणसी की पवित्र गलियाँ आज अवैध वाहनों की दौड़ में तब्दील हो चुकी हैं। सिग्नल की कोई परवाह नहीं, नियमों का कोई पालन नहीं और प्रशासन की पकड़ से बाहर यह ट्रैफिक सिस्टम अब ‘सिस्टम’ नहीं, बल्कि एक ‘सिंडिकेट’ बन गया है।

 

*वाहन श्रेणी अधिकृत परमिट अनुमानित वास्तविक संख्या*

 

ऑटो 5,500 30,000

ई-रिक्शा। 10,000 25,000

ईवी ऑटो 250 10,000

 

 

कुल अधिकृत संख्या: 15,000 | सड़कों पर अनुमानित वाहन: 60,000+

 

यानी, चार गुना से भी अधिक अवैध गाड़ियाँ वाराणसी की सड़कों पर धड़ल्ले से दौड़ रही हैं।

 

*फर्जी आई-कार्ड बना ‘बचाव कवच’*

 

अवैध वाहनों को बचाने के लिए फर्जी आई-कार्ड, प्रेस या वीआईपी स्टिकर का खुला खेल चल रहा है। नतीजा- चेकिंग के नाम पर सिर्फ दिखावा होता है। हैरानी की बात यह है कि हर बार चेकिंग की सूचना माफिया तक पहले ही पहुँच जाती है। सूत्रों का दावा है कि इस सिंडिकेट की जड़ें सिस्टम के भीतर तक फैली हुई हैं।

 

*अपराधी चालक, मौन प्रशासन*

 

स्थिति तब और भयावह हो जाती है जब चौक थाने में वांछित अपराधी खुलेआम अवैध ऑटो चलाते नजर आते हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि हर महीने एक ‘नियत राशि’ देकर ट्रैफिक विभाग को भी साध लिया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है? ट्रैफिक पुलिस नियम लागू कर रही है, या माफिया के इशारे पर चल रही है?

 

*वर्दी है, पर इच्छाशक्ति नहीं*

 

ट्रैफिक पुलिस के पास संसाधन हैं.. वर्दी, हेलमेट, सीटी और चौकियों की व्यवस्था.. लेकिन अगर कुछ नहीं है, तो वह है इच्छाशक्ति। आए दिन चेकिंग से जुड़ी सूचनाएं लीक हो जाती हैं और अवैध वसूली के आरोप व्हाट्सऐप ग्रुप्स तक सीमित नहीं, बल्कि सार्वजनिक चर्चा का विषय बन चुके हैं।

 

*समाधान क्या हो सकता है?*

 

फर्जी आई-कार्ड व स्टिकर बनाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई।

 

ट्रैफिक विभाग की आंतरिक जांच और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।

 

सभी अधिकृत व अवैध गाड़ियों की सार्वजनिक सूची जारी हो।

 

लाइव सीसीटीवी आधारित निगरानी, विशेष रूप से भीड़भाड़ वाले चौकों पर।

 

वीआईपी और आम नागरिक के लिए दोहरी व्यवस्था समाप्त हो।

 

*बड़ा सवाल*

 

वाराणसी का ट्रैफिक संकट अब केवल जाम का मुद्दा नहीं, बल्कि यह भ्रष्टाचार और अपराध के गठजोड़ का जीवंत उदाहरण बन चुका है।

क्या सरकार और प्रशासन अब भी आंखें मूंदे रखेंगे? या जनता यूँ ही माफिया के इस सिंडिकेट में धूल और धक्के खाती रहेगी?

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