देश अपने 76वें संविधान दिवस का जश्न मना रहा है। यह हर भारतवासी के लिए गौरव भरा पल पूर्वांचल राज्य ब्यूरो,गोरखपुर गोरखपुर।हर साल इस दिन कृतज्ञ राष्ट्र अपने संविधान निर्माताओं को भी याद करता है, और यह संकल्प दोहराता है कि समता स्वतंत्रता न्याय और बंधुता के आधार पर एक नया समाज बनाएंगे। यह भी शपथ ली जाती है कि हम सांविधानिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए पूरी निष्ठा के साथ काम करेंगे। हमारा संविधान हमें सिखाता है कि भारत का हर नागरिक चाहे वह किसी भी धर्म जाति वर्ण अथवा वर्ग का क्यों न हो, समान है। सबके अधिकार बराबर हैं और सबके कर्तव्य भी।
भारतीय संविधान 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। इसे बनाने में करीब 2 साल 11 महीने 18 दिन लगे। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने 19 नवम्बर 2015 को घोषणा की कि भारत सरकार हर वर्ष 26 नवम्बर को संविधान दिवस के रूप में मनाएगी। इसका पालन राष्ट्र का मार्गदर्शन करने वाले लोकतांत्रिक सिद्धांतों की याद दिलाता है।भारत का संविधान लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष और समतावादी ढांचे को परिभाषित करने वाला आधारभूत दस्तावेज है। पिछले सात दशकों में इसने राजनीतिक सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों के माध्यम से राष्ट्र का मार्गदर्शन किया है। न्याय स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व सुनिश्चित किया है, जो भारत के शासन के मूल सिद्धांत हैं। इन मूल्यों को हर साल संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है।संविधान निर्माण समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर थे, जिन्हें “संविधान का शिल्पकार” कहा जाता है। भारतीय संविधान दुनिया के सबसे विस्तृत और सर्वसमावेशी संविधानों में से एक है। इसमें नागरिकों के मौलिक अधिकार, कर्तव्य, निर्देशित सिद्धांत, चुनाव प्रक्रिया, केंद्र व राज्य सरकारों की शक्तियाँ, और न्याय व्यवस्था का विस्तार से वर्णन किया गया है।भारतीय संविधान की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसकी लचीलापन है। इसमें आवश्यकतानुसार संशोधन किए जा सकते हैं, जिससे समय और समाज की बदलती जरूरतों के अनुसार कानूनों को संशोधित किया जा सके। अब तक संविधान में सौ से अधिक संशोधन किए जा चुके हैं, जो इसकी प्रासंगिकता और जीवंतता का प्रमाण है। संविधान में न्यायपालिका को स्वतंत्र रखा गया है ताकि नागरिकों को निष्पक्ष न्याय मिल सके। इसके साथ ही संसदीय शासन प्रणाली अपनाई गई है, जिसमें लोकसभा और राज्यसभा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा, चुनाव आयोग, वित्त आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक जैसी संस्थाएँ भी संविधान के तहत स्थापित की गई हैं, जो देश के सुचारू संचालन में अहम भूमिका निभाती हैं।संविधान भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित करता है। इसका अर्थ है कि राज्य किसी भी धर्म को बढ़ावा नहीं देता और सभी धर्मों को समान सम्मान देता है। नागरिकों को अपनी पसंद का धर्म मानने, प्रचार करने और पालन करने की स्वतंत्रता है। भारतीय शासन प्रणाली ब्रिटेन के मॉडल पर आधारित है। इसमें सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है और संसद के प्रति जवाबदेह रहती है। प्रधानमंत्री कार्यपालिका का प्रमुख होता है और मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है।भारतीय संविधान में कुल 11 मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है, जो प्रत्येक नागरिक को देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का बोध कराते हैं। इन कर्तव्यों का उद्देश्य राष्ट्र की एकता, विकास और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करना है। संवैधानिक उपचार के अधिकार में यदि किसी नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन होता है तो वह सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में याचिका दायर कर सकता है। अदालतें नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष आदेश जारी कर सकती हैं। इसके अलावा नागरिकों को पर्यावरण जंगलों नदियों झीलों और वन्य जीवन की रक्षा करने का कर्तव्य भी सौंपा गया है। बच्चों को शिक्षा प्रदान करना महिलाओं की गरिमा का सम्मान करना तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और सुधारात्मक सोच अपनाना भी मौलिक कर्तव्यों का हिस्सा है। ये सभी कर्तव्य नागरिकों को याद दिलाते हैं कि अधिकारों के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाना भी हर भारतीय की जिम्मेदारी है।
भारतीय संविधान देश को लोकतंत्र का स्वरूप देता है। यह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है, सरकार की शक्तियों को सीमित करता है और शासन को पारदर्शी बनाता है। संविधान के बिना कोई भी राष्ट्र व्यवस्थित रूप से नहीं चल सकता। हमें समानता न्याय स्वतंत्रता और बंधुत्व की ओर अग्रसर करता है। संविधान देश की विविधता को एक सूत्र में पिरोता है और भारत की एकता को मजबूत बनाता है। भारतीय संविधान आज भी अपनी प्रासंगिकता और महत्व बनाए हुए है। यह देश की प्रगति, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय का स्तंभ है। हमें अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का पालन भी करना चाहिए, तभी हम संविधान की गरिमा को बनाए रख पाएंगे।










