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क्या सवर्ण होना अब गुनाह है? गरीब ब्राह्मण की जमीन पर मड़ई डाल कब्जा, प्रशासन मौन

क्या सवर्ण होना अब गुनाह है? गरीब ब्राह्मण की जमीन पर मड़ई डाल कब्जा, प्रशासन मौन

पूर्वांचल राज्य ब्यूरो, सोनभद्र (जुगैल)।

 

(संवाददाता- राजेश कुमार वर्मा)

ज़मीन पर हक़ की लड़ाई अब जाति की दीवार से टकरा गई है। तहसील ओबरा के ग्राम चतरवार में एक गरीब ब्राह्मण परिवार अपनी ही पैतृक ज़मीन के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। नागेन्द्र देव पाण्डेय, जिनके पिता स्वर्गीय बिहारी देव पाण्डेय ने यह ज़मीन वर्षों पहले अर्जित की थी, आज अपने बेटे संग उस पर खेती तक नहीं कर पा रहे। विरोधियों ने ज़मीन पर जबरन मड़ई डाल दी है और रास्ता तक रोक दिया है।

 

पीड़ित नागेन्द्र पाण्डेय बताते हैं कि 29 जुलाई 2025 को प्रशासन के साथ नापी के दौरान भी विपक्षियों ने कानूनगो व लेखपाल के सामने बदसलूकी की, लेकिन कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद जब उन्होंने रास्ता साफ करने का प्रयास किया तो विपक्षियों विशुन, उसकी पत्नी फुलवा, बेटे छोटे व बुलई, कुटिल केवट और उसके बेटे बबुन्दर ने न सिर्फ रास्ता रोक दिया बल्कि गाली-गलौज और मारपीट पर भी आमादा हो गए।

 

*राजस्व टीम ने जमीन चिन्हित कर दी, फिर भी कब्जा क्यों नहीं हटाया गया?*

 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में राजस्व टीम द्वारा यह स्पष्ट कर दिया गया कि ज़मीन पीड़ित नागेन्द्र पाण्डेय की है, तो फिर अब तक उस पर से अवैध कब्जा क्यों नहीं हटाया गया?

पीड़ित वर्षों से इस जमीन पर जुताई-बुवाई कर रहे हैं, फिर भी विरोधियों द्वारा की गई जबरन मड़ईबाज़ी और कब्जा अब तक बरकरार है।

क्या प्रशासन किसी बड़ी घटना का इंतज़ार कर रहा है? या फिर गरीब की आह और अपील अब सिर्फ फाइलों में दर्ज होकर रह गई है?

 

*सवाल उठता है- क्या गरीब सवर्ण होना अब अपराध है?*

 

जब सरकारी नौकरियों में आरक्षण के चलते गरीब सवर्णों को अवसर नहीं मिलता, तो क्या अब उन्हें अपने ज़मीन-जायदाद पर भी हक नहीं मिलेगा?

क्या ब्राह्मण होना अब अभिशाप है? एक गरीब ब्राह्मण पिता-पुत्र को अपनी ही ज़मीन पर खेती करने से रोका जा रहा है, और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है।

 

*प्रशासन मौन, दबंग बेलगाम*

 

ग्रामीणों का कहना है कि विपक्षीगण खुलेआम धमकियां देते हैं, और पीड़ित परिवार डर के मारे अपने ही गांव में चैन से नहीं रह पा रहा।

अब सवाल यह है कि जब कानून के सहारे भी इंसाफ न मिले, तो आम आदमी कहां जाए?

जनता जानना चाहती है

जब राजस्व टीम ने साफ तौर पर ज़मीन चिन्हित कर दी है, तो कब्जा हटाने में देरी क्यों?

 

क्या प्रशासन दबंगों के आगे झुक गया है?

 

क्या गरीब सवर्ण होना इस देश में धीरे-धीरे एक सामाजिक अपराध बनता जा रहा है?

 

पीड़ित परिवार ने जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक से न्याय की गुहार लगाई है।

अब देखना यह है कि क्या कार्रवाई होगी या यह मामला भी अफसरशाही की धूल में दब जाएगा?

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