नेपाल में लोकतंत्र पर संकट: सोशल मीडिया बैन से उपजा जनविद्रोह, हिंसा और सत्ता परिवर्तन तक
पूर्वांचल राज्य ब्यूरो
महराजगंज
भारत-नेपाल सीमा से पूर्वी उ0प्र0 प्रभारी फणीन्द्र कुमार मिश्र व महराजगंज ब्यूरो प्रभारी अनिल जायसवाल की समीक्षात्मक स्पेशल रिपोर्ट
नेपाल में पिछले दिनों जिस तरह घटनाएँ तेजी से बदलीं, उसने पूरे दक्षिण एशिया का ध्यान खींच लिया। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाना सरकार को इतना भारी पड़ा कि देखते ही देखते देश हिंसा, आगजनी और राजनीतिक संकट में घिर गया। प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों तक के इस्तीफे और सेना की तैनाती इस बात का संकेत हैं कि नेपाल इस समय एक गहरे संक्रमण काल से गुजर रहा है।
कारण: क्यों भड़की आग?
◆1. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश – Facebook, X और YouTube पर पाबंदी को युवाओं ने अपनी आवाज़ दबाने की कोशिश माना।
◆2. बेरोजगारी और भ्रष्टाचार – लंबे समय से बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से त्रस्त युवा वर्ग गुस्से से भरा हुआ था, सोशल मीडिया प्रतिबंध ने चिंगारी का काम किया।
◆3. राजनीतिक अस्थिरता की पृष्ठभूमि – नेपाल की राजनीति पिछले दो दशकों से अस्थिर रही है। बार-बार सरकार बदलने और नेताओं की जवाबदेही न होने से जनता का भरोसा पहले ही कमजोर था।
घटनाक्रम: विरोध से हिंसा तक
सोशल मीडिया प्रतिबंध के खिलाफ काठमांडू और कई शहरों में युवाओं का प्रदर्शन शुरू हुआ।
पुलिस ने शुरुआत में हल्के बल का प्रयोग किया लेकिन हालात काबू से बाहर होते ही गोलीबारी करनी पड़ी।
परिणाम: कम से कम 19 मौतें और सैकड़ों घायल
भीड़ ने संसद भवन, नेताओं के आवास और होटलों को आग के हवाले कर दिया।
सत्ता संकट और इस्तीफे
गृह मंत्री रमेश लेक्खक ने सबसे पहले मौतों की जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ा।
कृषि मंत्री राम नाथ अधिकारी ने भी हिंसा देखकर इस्तीफा दे दिया।
अंततः भारी दबाव में प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने भी पद से त्यागपत्र दिया।
इन इस्तीफों ने यह साफ कर दिया कि सरकार हालात संभालने में पूरी तरह विफल रही।
*फौरी उपाय: सेना और कर्फ्यू*
सेना ने राजधानी और संवेदनशील इलाकों में मोर्चा संभाला।
अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगाया गया ताकि हालात काबू में रह सकें।
इस कदम ने यह संकेत भी दिया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की बजाय अब बल प्रयोग से व्यवस्था चल रही है।
*तत्काल परिणाम*
◆सोशल मीडिया बैन वापस – प्रदर्शनकारियों की पहली जीत।
◆जनता और सरकार के बीच अविश्वास और गहरा।
◆पर्यटन और अर्थव्यवस्था पर गहरा असर – जलते होटल, फंसे पर्यटक और ठप व्यापार।
*भविष्य की संभावनाएँ*
◆1. राजनीतिक अस्थिरता का बढ़ना – प्रधानमंत्री के इस्तीफे के बाद नई सत्ता संरचना कैसी होगी, यह अनिश्चित है।
◆2. युवाओं की शक्ति – यह विद्रोह साबित करता है कि नेपाल में युवा अब सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरण बदलने वाले कारक हैं।
◆3. लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल – यदि सेना लंबे समय तक सक्रिय रही तो लोकतंत्र कमजोर होगा।
◆4. आर्थिक संकट – पर्यटन, विदेशी निवेश और व्यापार पर असर पड़ने से नेपाल को गहरे आर्थिक झटके का खतरा है।
निष्कर्ष
नेपाल की मौजूदा स्थिति यह बताती है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ दबाना आत्मघाती साबित हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से उपजा असंतोष अब सड़कों पर हिंसा बनकर फट पड़ा। सरकार गिर गई, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या नई सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी उतरेगी या फिर यह संकट और गहरा होगा।










