बिल्ली और कुत्ते की तकरार बनी तलाक की वजह!
भोपाल में इंजीनियर दंपती के रिश्ते पर पालतू जानवरों की अनबन भारी
पूर्वांचल राज्य ब्यूरो भोपाल (मध्य प्रदेश)।
(संवाददाता- राजेश कुमार वर्मा)
भोपाल के कुटुंब न्यायालय में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक नवविवाहित इंजीनियर दंपती ने सिर्फ इसलिए तलाक की अर्जी दाखिल कर दी क्योंकि उनके पालतू जानवर आपस में नहीं बनते। पति के दो कुत्ते और पत्नी की एक बिल्ली के बीच बढ़ती तकरार ने दांपत्य जीवन में ऐसी दरार डाली कि अब मामला परिवार परामर्श केंद्र तक पहुंच गया है।
दोनों आईटी सेक्टर में कार्यरत हैं और पशु प्रेम के चलते एक पशु बचाव अभियान में मिले थे। मुलाकात दोस्ती में बदली और दिसंबर 2024 में दोनों ने हिंदू रीति-रिवाज से विवाह कर लिया। युवती उत्तर प्रदेश की रहने वाली है, जबकि युवक भोपाल का निवासी है। विवाह के समय दोनों ने पालतू जानवरों के प्रति प्रेम और सहयोग की भावना व्यक्त की थी, लेकिन विवाह के कुछ महीनों में ही हालात बदल गए।
पत्नी अपने साथ पालतू बिल्ली लाई थी, जबकि पति पहले से ही दो कुत्ते, एक खरगोश और मछलियां पालता था। शुरू में दोनों ने एक-दूसरे के जानवरों की देखभाल में सहमति जताई, लेकिन जल्द ही यह सामंजस्य विवाद में बदल गया।
पति का आरोप है कि बिल्ली दिनभर म्याऊं-म्याऊं करती है, मछलियों पर झपटने की कोशिश करती है और कुत्तों का खाना भी खा जाती है। उसे लगता है कि वह अपने पालतू जानवरों के साथ चैन से नहीं रह पा रहा।
दूसरी ओर, पत्नी का कहना है कि पति का कुत्ता उसकी बिल्ली को डराता है और वह अपनी बिल्ली को अपनी बेटी जैसा मानती है, उससे अलग रहना उसके लिए असंभव है।
मामला जब गंभीर हुआ तो परिजनों के हस्तक्षेप के बाद कुटुंब न्यायालय के परिवार परामर्श केंद्र में दोनों को काउंसलिंग के लिए बुलाया गया। काउंसलर शैल अवस्थी ने बताया कि पहली काउंसलिंग में पति ने स्पष्ट कर दिया कि वह अब बिल्ली के साथ नहीं रह सकता, जबकि पत्नी का कहना है कि बिल्ली की उदासी वह बर्दाश्त नहीं कर सकती। अगली काउंसलिंग दशहरा के बाद रखी गई है, जिसमें दोनों को एक बार फिर समझाने की कोशिश की जाएगी।
काउंसलर का कहना है कि शादी को अभी महज आठ महीने ही हुए हैं, लेकिन पालतू जानवरों को लेकर दोनों के बीच गलतफहमियां इतनी बढ़ गई हैं कि वे रिश्ते को ही समाप्त करने पर आमादा हैं।
यह मामला न केवल आधुनिक जीवनशैली और व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के टकराव को दिखाता है, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि क्या आज के युवा वैवाहिक जीवन की गंभीरता को समझ पा रहे हैं?
जहां एक ओर हिंदू संस्कृति में विवाह को सात जन्मों का बंधन माना जाता है, वहीं महज आठ महीनों में जानवरों की वजह से तलाक तक बात पहुंचना सामाजिक और मानसिक रूप से चिंताजनक है।
क्या अब विवाह भी समझौतों के बजाय शर्तों का खेल बन चुका है?
आज जब रिश्तों को निभाने की बजाय छोड़ा जाना आसान लगने लगा है, तब ऐसे मामले हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या पालतू जानवरों से प्रेम, वैवाहिक जीवन से बड़ा हो गया है?










