कानपुर के ‘करोड़पति कानूनगो’ का खुलासा – 30 करोड़ की 41 संपत्तियाँ, फिर भी सिर्फ डिमोशन?
पूर्वांचल राज्य ब्यूरो कानपुर।
राजस्व विभाग की साख पर एक और बड़ा दाग लगाते हुए, कानपुर में तैनात कानूनगो आलोक दुबे के खिलाफ जमीन घोटाले में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। आलोक दुबे ने पिछले कुछ वर्षों में करीब 30 करोड़ रुपये की 41 भू-संपत्तियाँ खरीदीं, जिनमें से 8.62 हेक्टेयर भूमि उनके और एक क्षेत्रीय लेखपाल अरुणा द्विवेदी के नाम पर दर्ज है।
इन फर्जी जमीन सौदों में दस्तावेजों की हेरफेर, वरासत और बैनामा की चालबाजियों के चलते जिलाधिकारी जितेन्द्र प्रताप सिंह ने उन्हें पदावनत कर लेखपाल बना दिया.. लेकिन सवाल उठ रहा है कि इतने गंभीर भ्रष्टाचार के बावजूद सिर्फ पद घटाना ही पर्याप्त है?
क्या सिर्फ पदावनति ही काफी है? निलंबन या बर्खास्तगी क्यों नहीं?
भ्रष्टाचार की परतें तब खुलीं जब 2 दिसंबर 2024 को अधिवक्ता संदीप सिंह चंदेल ने जिलाधिकारी को शिकायत पत्र सौंपा। इसमें आरोप लगाया गया कि सिंहपुर कछार में चार बीघा जमीन फर्जी कागज़ों के आधार पर बेची गई। जिलाधिकारी ने एडीएम न्यायिक, एसडीएम सदर और एसीपी कोतवाली की तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की।
जांच में सामने आया कि आलोक दुबे ने विवादित भूमि पर 11 मार्च 2024 को वरासत दर्ज कर उसी दिन बैनामा करा लिया, और फिर कुछ ही महीनों बाद उस भूमि को निजी कंपनी (आरएनजी इंफ्रा) को बेच दिया। भूमि का बाजार मूल्य लगभग चार करोड़ रुपये आँका गया।
क्या यह सुनियोजित जालसाजी नहीं?
क्या यह राजस्व तंत्र में गहराई तक घुसे भ्रष्टाचार का सीधा उदाहरण नहीं?
41 रजिस्ट्री, करोड़ों की संपत्ति – लेकिन “मानव संपदा पोर्टल” पर कोई रिकॉर्ड नहीं!
सहायक महानिरीक्षक निबंधन की रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि आलोक दुबे और उनके परिजनों के नाम पर 41 संपत्तियों की रजिस्ट्री पाई गई, जिनकी बाजार कीमत लगभग 30 करोड़ रुपये है।
इनमें अधिकांश संपत्तियाँ बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति और मानव संपदा पोर्टल पर सूचना दर्ज किए बिना खरीदी गईं।
क्या यह खुल्लमखुल्ला सेवा शर्तों का उल्लंघन नहीं है?
फिर भी कार्रवाई महज़ एक डिमोशन तक सीमित क्यों रही?
29 साल से एक ही जगह जमे रहने का राज क्या है?
धोखाधड़ी का आरोपित आलोक दुबे, वर्ष 1993 में लेखपाल के पद पर नियुक्त हुआ था। वर्ष 1995 से लगातार 29 वर्षों तक सदर तहसील में जमे रहना अपने आप में ही एक संकेत है।
स्थानांतरण आदेश कई बार हुए, लेकिन वह संबद्धीकरण का सहारा लेकर हर बार सदर तहसील लौट आता रहा।
वर्ष 2022 से 2025 तक तहसील लेखपाल संघ का अध्यक्ष भी रहा।
प्रमोशन के बाद नर्वल तहसील स्थानांतरित हुआ, लेकिन फिर अधिकारियों की ‘मेहरबानी’ से सदर में वापसी कर ली।
क्या इतने वर्षों तक एक ही तहसील में टिके रहना संभव है बिना अंदरूनी संरक्षण के?
लेखपाल अरुणा द्विवेदी की भूमिका भी संदिग्ध, कार्रवाई लंबित
जिन विवादित भू-संपत्तियों की बात हो रही है, उनमें कई पर लेखपाल अरुणा द्विवेदी का नाम भी दर्ज है।
उनकी भूमिका भी इस जमीन घोटाले में अहम मानी जा रही है।
एसडीएम सदर स्तर से उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की तैयारी की जा रही है।
सवाल उठते हैं… और उठने भी चाहिए
जब करोड़ों की हेराफेरी सामने है, तो पदावनति से क्या संदेश जाएगा?
क्या यह भ्रष्टाचार के लिए परोक्ष रूप से इनाम नहीं बनता?
जब करोड़पति बाबू जनता के ज़मीन अधिकारों को लूट रहा हो, तो व्यवस्था की चुप्पी क्या दर्शाती है?
भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने वाले अधिकारी कब कटघरे में आएंगे?
सिर्फ घोटाला नहीं, राजस्व व्यवस्था की चूकों का आईना है यह मामला
अब देखना है कि शासन-प्रशासन इस पर और क्या कदम उठाता है!
या फिर यह मामला भी बाकी घोटालों की तरह फाइलों और बहानों में दफ्न कर दिया जाएगा?










