भीगी काशी, बरसे इंद्रदेव – पर राम-भरत मिलन की आस्था रही अडिग
पूर्वांचल राज्य ब्यूरो वाराणसी।
शुक्रवार 3 अक्टूबर को काशी की धरती पर एक बार फिर इतिहास दोहराया गया। तेज बारिश के बीच 482 वर्षों पुरानी राम-भरत मिलन लीला श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हुई। इंद्रदेव जमकर बरसे, परंतु श्रद्धालुओं की आस्था न डगमगाई। लाखों लोगों ने छातों में, भीगते हुए प्रभु श्रीराम और भरत के मिलन के इस अद्भुत दृश्य का साक्षी बनने का सौभाग्य पाया।
चारों भाइयों का मिलन, भावविभोर हुई काशी
बनारस की यह लीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि परंपरा, प्रेम और भाईचारे का जीवंत प्रतीक है। श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जब सजीव स्वरूपों में गले मिले, तो पूरा माहौल भक्ति में डूब गया। हर आंख नम थी, हर दिल भावविभोर।
482 वर्षों से निभ रही परंपरा, यदुवंशी उठाते हैं प्रभु का रथ
यह लीला उतनी ही पुरानी है जितनी बनारस की आत्मा। यदुवंशी समाज सदियों से इस रथ को अपने कंधों पर उठाने का सौभाग्य पाता है। 200 किलो से अधिक वजनी रथ को वे लाल पगड़ी, सफेद बनियान और धोती पहनकर उठाते हैं। यह ड्रेस कोड उनके समर्पण और गौरव का प्रतीक बन गया है।
स्वप्न से जन्मी लीला, हर वर्ष होता है साक्षात दर्शन
मान्यता है कि 482 साल पहले मेघा भगत को स्वप्न में श्रीराम ने दर्शन दिए थे, जिसके बाद इस लीला की शुरुआत हुई। तब से हर वर्ष यह आयोजन ऐसे होता है मानो स्वयं भगवान अपने भक्तों से मिलने आते हों।
काशी नरेश देते हैं सोने की गिन्नी, राजपरिवार की भी उपस्थिति
परंपरा के अनुसार, काशी नरेश द्वारा सोने की गिन्नी भेंट की जाती है। इस वर्ष राजपरिवार के कुंवर अनंतनारायणन सिंह ने वर्षा में भीगते हुए इस परंपरा में भाग लिया और समाज के साथ कंधे से कंधा मिलाया।
बारिश और भक्ति का संगम
सुबह से हो रही झमाझम बारिश ने मौसम को भिगोया, लेकिन काशीवासियों की श्रद्धा और उमंग को नहीं। हजारों की भीड़ ने छाते लिए, पॉलिथीन ओढ़े या यूं ही भीगते हुए प्रभु के दर्शन किए। लगता था जैसे इंद्रदेव स्वयं इस पावन मिलन की वर्षा से शोभा बढ़ा रहे हों।
काशी की यह राम-भरत मिलन लीला केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन परंपरा की आत्मा है। भीगते हुए श्रद्धालुओं ने यह संदेश दिया…
जब आस्था सच्ची हो, तो बारिश भी आशीर्वाद बन जाती है।










